1. गिरफ्तारी क्या है?

    बलेनटाइन्स लाॅ डिक्षनरी 1948 संस्करण पृष्ठ सं. 105, के अनुसार गिरफ्तारी से तात्पर्य किसी दूसरे व्यक्ति को लेने, जब्त करने या कब्जे में लेने या तो छूकर या हाथ से पकड़ कर या किसी क्रिया द्वारा रोककर हिरासत में रखना जो उसे हवालात में रखने के इरादे को दर्शाता हो और इस क्रिया के द्वारा गिरफ्तारी की वास्तविक नियंत्रण, गिरफ्तार करने वाले व्यक्ति पर होता है । दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की अध्याय ट और 59 की धारा 41 व्यक्तियों के गिरफ्तारी को संबोधित करता है । दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 41(1) के अनुसार कोई पुलिस अधिकारी बिना मजिस्ट्रेट के आदेश तथा वारंट के किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकता है। यदि  
      • वह किसी संज्ञेय अपराध में संक्षिप्त हो, या उसके विरूद्ध वाजिब शिकायत की गई है या उसके विरूद्ध विष्सनीय सूचना प्राप्त हुआ है या पर्याप्त संदेह हो या  
      • जिसके पास मकान तोड़ने का कोई उपकरण हो, या
      • जिसे अपराधी घोषित किया गया है या
      • जिसके पास से कोई ऐसी वस्तु पाया जाए जिससे यह संदेह उत्पन्न हो कि यह चोरी का माल है ; या
      • जो किसी पुलिस अधिकारी को अपने कानूनी दायित्वों को निभाने में अड़चन पैदा करे या कानूनी हिरासत से भागे या भागने की कोशिश करें । 
    • दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 42 के अनुसार ऐसा व्यक्ति जो पुलिस अधिकारी की उपस्थिति में गैर-संज्ञेय अपराध किया हो या उसे इसका दोशी करार कर दिया हो और फिर अधिकारी द्वारा उसका नाम और पता पूछने पर जानकारी देने से इंकार करें, तो भी उसे गिरफ्तार किया जा सकता है।
    • दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 50 के अनुसार बिना वारंट के गिरफ्तार व्यक्ति को यह सूचित किया जाना है कि उसे किस आधार पर गिरफ्तार किया गया है और जमानत मिलने के कौन से तरीके हैं ।  
    • दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 53 के अनुसार यदि यह मानने के पर्याप्त आधार हो कि गिरफ्तार किए हुए व्यक्ति से पूछताछ करने से अपराध करने की साक्ष्यों को पता लग जाएगा तो पंजीकृत चिकित्सक के लिए वह कानूनन सही होगा कि वह उप-निरीक्षक के रैंक वाले या इससे ऊपर रैंक के पुलिस अधिकारी (उसकी सहायता या निर्देश में सद्भावना से कार्य करने वाले किसी व्यक्ति के लिए) के अनुरोध पर जैसा आवश्यक हो, गिरफ्तार हुए व्यक्ति की जाँच करे और जैसा कि ऐसे बल का प्रयोग इस प्रयोजन हेतु आवश्यक है ।
    • यदि इस धारा के अंतर्गत किसी महिला की जाँच किया जाना है तो ऐसी जाँच केवल पंजीकृत महिला चिकित्सक द्वारा या उसके निगरानी में ही किया जाए । दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 56 के अनुसार बिना वारंट के गिरफ्तार करने वाला पुलिस अधिकारी बिना अनावश्यक विलंब और जमानत के लिए समाविष्ट प्रावधानों के अनुसार गिरफ्तार किए हुए व्यक्ति को इस मामले में क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष या पुलिस थाना के प्रभारी अधिकारी के समक्ष लेकर जाएंगे या भेजेंगे ।
    • दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 57 के अनुसार कोई पुलिस अधिकारी बिना वारंट के गिरफ्तार हुए व्यक्ति को लंबे समय तक हिरासत में नहीं रख सकता है जब तक कि इस मामले की सभी परिस्थितियाँ उचित हो और ऐसी हिरासत की अवधि धारा 167 के अंतर्गत बिना मजिस्ट्रेट के विशेष आदेश से 24 घंटे से अधिक नही होना चाहिए । इस अवधि में गिरफ्तारी के स्थान से मजिस्ट्रेट न्यायालय तक की यात्रा के लिए आवश्यक समय शामिल नहीं है ।
    • दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 151 के अनुसार संज्ञेय अपराध घटित न हों, के लिए भी किसी व्यक्ति गिरफ्तार किया जा सकता है ।
  2. ‘‘जमानतीय/गैर-जमानतीय’’ अपराध क्या है ?
    1. दंड प्रक्रिया संहिता 1973 (प्रथम अनुसूची) के अंतर्गत अपराध को ‘जमानतीय और गैर जमानतीय’ अपराध के रूप में वर्गीकृत किया गया है ।
    2. जमानतीय अपराध के मामले में अन्वेषण अधिकारी जमानत देने के लिए बाध्य है तथापि गैर जमानतीय अपराध के मामले में पुलिस जमानत नहीं दे सकता है और इसके लिए केवल न्यायिक मजिस्ट्रेट/न्यायाधीश द्वारा ही जमानत दिया जा सकता है ।
    3. गैर-जमानतीय अपराध के मामले में अन्वेषण अधिकारी दोशी व्यक्ति को गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट/न्यायाधीश के समक्ष पेश करना होगा । उस समय दोशी व्यक्ति को जमानत के लिए आवेदन करने का अधिकार होता है ।
top